नई दिल्ली : कहते हैं
कि संगीत हमारी रूह है। अगर हम ध्यान से सुनें तो हवाओं के शोर में, पेड़ों की पत्तियों की सरसराहट में, पंक्षियों के
चहचहाहट में, नदियों और झरनों के पानी के बहाव में, बारिश के रिमझिम बरसने में, बच्चों की मासूम
खिलखिलाहट में भी संगीत है। दिल की धड़कनों में भी सुर होता है, गम में और ख़ुशी में, यहां तक हमारी हर सांस में
संगीत बसा है।
यही संगीत जब
देशभक्ति के राग में समाहित होता है, तो इसका
उन्माद अलग ही प्रतीत होता है। फिर तो इसे सुनने में एक अलग ही आनन्द प्राप्त होता
है। जब बात हो सुर सम्राज्ञी लता मंगेशकर के आवाज़ की, तो उनके
बारे में तो बच्चा-बच्चा जनता है। हम बात कर रहे है गीत ‘ऐ
मेरे वतन के लोगों’ की जिसे सुनने के बाद हर हिन्दुस्तानी की
आखें नम हो जाती है।
निश्चित रूप से आपको
पता होगा कि इस गीत के रचयिता महान गीतकार व कवि प्रदीप थे। लेकिन क्या आपको इस
गीत के रचे जाने से लेकर गाए जाने तक की कहानी पता है? अगर नहीं तो आइये जानते हैं।
बता दे कि प्रदीप ने ‘ऐ मेरे वतन के लोगों’ का मुखड़ा मुंबई में समंदर के
पास टहलते हुए सिगरेट के एक खाली पैकेट पर लिखा था।
जी हां, यह जानकर आप चोंक गये होंगे पर यह बात सत्य है। दरअसल, वर्ष 1962 में चीन से धोखे में मिली हार और शहीद शैतानसिंह व अन्य शहीदों
की शहादत पूरे देश के जहन में उथल-पथल मचा रखी थी। ऐसे अवसर पर कवि प्रदीप से
बार-बार एक देशभक्ति गीत लिखने का आग्रह किया गया, ताकि पूरे
देश के लोगों में फिर से जोश भरा जा सके।
कवि प्रदीप, जो खुद भी हर भारतीय की तरह वर्ष 1962 के युद्ध की हार से निराश थे,
एक दिन मुंबई के माहिम बीच पर सैर के लिए निकले। अचानक उनके दिमाग
में ये पंक्तियां आईं। उन्होंने अपने साथ सैर पर आए साथी से पेन मांगा और चारमीनार
सिगरेट के डिब्बे से प्लास्टिक हटाकर उस पर इस गाने का पहला छंद लिखा, “ऐ मेरे वतन के लोगों, आंखों में भर लो पानी, जो शहीद हुए हैं उनकी, जरा याद करो कुर्बानी।”
इस गीत के लिखे जाने
से कुछ हफ्ते पहले ही निर्माता महबूब खान ने उनसे राष्ट्रीय स्टेडियम में आयोजित
एक कार्यक्रम के लिए उद्घाटन गीत लिखने के लिए कहा था। प्रदीप का जवाब था वह इसके
लिए तैयार हैं, लेकिन वे अभी इसकी कोई जानकारी नहीं
देंगे। इसके बाद उन्होंने लता मंगेशकर और संगीत निर्देशक सी. रामचंद्र को अपनी इस
योजना में शामिल कर लिया, और उसके बाद जो हुआ, वह एक इतिहास है।
जब दिल्ली के नेशनल
स्टेडियम में करीब 50 हजार हिंदुस्तानियों के हुजूम के सामने पहली बार ये गीत
गूंजा था। गीत के एक-एक शब्द पंडित जवाहर लाल नेहरू को उद्वेलित कर रहे थे। हर तरफ
खामोशी थी। चारों तरफ आंखें नम थी। ख़ासकर इस गीत की वो पंक्तियां ‘एक-एक ने दस को मारा’ ने भावनाओं का ऐसा ज्वार पैदा हुआ कि चीन के धोखे से चोट खाया हिमालय भी
रो पड़ा।
सुनिए
ये देशभक्ति गीत :-
Source@Topyaps
नई दिल्ली : कहते हैं
कि संगीत हमारी रूह है। अगर हम ध्यान से सुनें तो हवाओं के शोर में, पेड़ों की पत्तियों की सरसराहट में, पंक्षियों के
चहचहाहट में, नदियों और झरनों के पानी के बहाव में, बारिश के रिमझिम बरसने में, बच्चों की मासूम
खिलखिलाहट में भी संगीत है। दिल की धड़कनों में भी सुर होता है, गम में और ख़ुशी में, यहां तक हमारी हर सांस में
संगीत बसा है।
यही संगीत जब
देशभक्ति के राग में समाहित होता है, तो इसका
उन्माद अलग ही प्रतीत होता है। फिर तो इसे सुनने में एक अलग ही आनन्द प्राप्त होता
है। जब बात हो सुर सम्राज्ञी लता मंगेशकर के आवाज़ की, तो उनके
बारे में तो बच्चा-बच्चा जनता है। हम बात कर रहे है गीत ‘ऐ
मेरे वतन के लोगों’ की जिसे सुनने के बाद हर हिन्दुस्तानी की
आखें नम हो जाती है।
निश्चित रूप से आपको
पता होगा कि इस गीत के रचयिता महान गीतकार व कवि प्रदीप थे। लेकिन क्या आपको इस
गीत के रचे जाने से लेकर गाए जाने तक की कहानी पता है? अगर नहीं तो आइये जानते हैं।
बता दे कि प्रदीप ने ‘ऐ मेरे वतन के लोगों’ का मुखड़ा मुंबई में समंदर के
पास टहलते हुए सिगरेट के एक खाली पैकेट पर लिखा था।
जी हां, यह जानकर आप चोंक गये होंगे पर यह बात सत्य है। दरअसल, वर्ष 1962 में चीन से धोखे में मिली हार और शहीद शैतानसिंह व अन्य शहीदों
की शहादत पूरे देश के जहन में उथल-पथल मचा रखी थी। ऐसे अवसर पर कवि प्रदीप से
बार-बार एक देशभक्ति गीत लिखने का आग्रह किया गया, ताकि पूरे
देश के लोगों में फिर से जोश भरा जा सके।
कवि प्रदीप, जो खुद भी हर भारतीय की तरह वर्ष 1962 के युद्ध की हार से निराश थे,
एक दिन मुंबई के माहिम बीच पर सैर के लिए निकले। अचानक उनके दिमाग
में ये पंक्तियां आईं। उन्होंने अपने साथ सैर पर आए साथी से पेन मांगा और चारमीनार
सिगरेट के डिब्बे से प्लास्टिक हटाकर उस पर इस गाने का पहला छंद लिखा, “ऐ मेरे वतन के लोगों, आंखों में भर लो पानी, जो शहीद हुए हैं उनकी, जरा याद करो कुर्बानी।”
इस गीत के लिखे जाने
से कुछ हफ्ते पहले ही निर्माता महबूब खान ने उनसे राष्ट्रीय स्टेडियम में आयोजित
एक कार्यक्रम के लिए उद्घाटन गीत लिखने के लिए कहा था। प्रदीप का जवाब था वह इसके
लिए तैयार हैं, लेकिन वे अभी इसकी कोई जानकारी नहीं
देंगे। इसके बाद उन्होंने लता मंगेशकर और संगीत निर्देशक सी. रामचंद्र को अपनी इस
योजना में शामिल कर लिया, और उसके बाद जो हुआ, वह एक इतिहास है।
जब दिल्ली के नेशनल
स्टेडियम में करीब 50 हजार हिंदुस्तानियों के हुजूम के सामने पहली बार ये गीत
गूंजा था। गीत के एक-एक शब्द पंडित जवाहर लाल नेहरू को उद्वेलित कर रहे थे। हर तरफ
खामोशी थी। चारों तरफ आंखें नम थी। ख़ासकर इस गीत की वो पंक्तियां ‘एक-एक ने दस को मारा’ ने भावनाओं का ऐसा ज्वार पैदा हुआ कि चीन के धोखे से चोट खाया हिमालय भी
रो पड़ा।
सुनिए
ये देशभक्ति गीत :-
Source@Topyaps
place ad code

0 comments :